शब्द संरचना का वैज्ञानिक विश्लेषण
भाषा ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने भावों और विचारों को एक-दूसरे तक पहुंचाता है। ध्वनियाँ भाषा के विभिन्न स्तरों पर संरचित होकर वाक्य बनाती हैं। वाक्य में शब्द होते हैं। शब्दों के अर्थ होते हैं किंतु जब शब्दों का वाक्य में प्रयोग किया जाता है केवल तभी वे संप्रेषणीय बन पाते हैं।
शब्द – परिभाषा, भेद और उदाहरण
शब्द की परिभाषा
"भाषा की वह लघुतम स्वतंत्र सार्थक इकाई जिसका स्वतंत्र प्रयोग किया जा सके, शब्द कहलाती है।"
दूसरे शब्दों में 'शब्द' वह ध्वनि समूह है जिसका अपना एक अर्थ होता है। सामान्यतः शब्द एक से अधिक ध्वनियों से मिलकर बनते हैं। ध्वनियों का अपना कोई अर्थ नहीं होता। किंतु हर भाषा में बहुत सारे शब्द एकाधिक सार्थक खंडों से मिलकर बने होते हैं। जिन शब्दों के और अधिक सार्थक खंड नहीं किए जा सकते, वे 'मूल' शब्द कहलाते हैं। भाषा विज्ञान में 'रूपिम' की संकल्पना दी गई है।

रूपिम (Morpheme)
मुक्त रूपिम : घर, जल, राम
बद्ध रूपिम : प्र-, सु-, -ता, -पन
मूल रूपिम : मूल शब्द (Root Morphemes)
व्युत्पादक रूपिम : उपसर्ग एवं प्रत्यय से निर्मित रूप (Derivational Morphemes)
रूपसाधक (Inflectional) रूपिम : व्याकरणिक रूप परिवर्तन करने वाले रूपिम
सभी मूल शब्द और उपसर्ग/प्रत्यय रूपिम होते हैं। जिन शब्दों में एक से अधिक सार्थक खंड मिले होते हैं, वे निर्मित/व्युत्पादित शब्द (derived word) कहलाते हैं। निर्मित शब्दों में प्रयुक्त सार्थक घटकों की व्यवस्था उनकी 'शब्द संरचना' है। जैसे:-
क + म + ल = कमल (यह शब्द है क्योंकि इसका अर्थ है)
म + क + ल = मकल, या ल + म + क = लमक, या ल + क + म = लकम (ये शब्द नहीं हैं क्योंकि इनका कोई अर्थ नहीं है)
शब्द-भेद
शब्द-भेदों के निम्नलिखित आधार हैं :-
वाक्य में प्रयोग के आधार पर शब्द के भेद
रचना या बनावट के आधार पर शब्द के भेद
उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर शब्द के भेद
व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर शब्द के भेद
अर्थ के आधार पर शब्द के भेद
1. वाक्य में प्रयोग के आधार पर शब्द-भेद :
वाक्य में प्रयोग के आधार पर शब्द के दो भेद हैं-
(क) सार्थक शब्द : सार्थक शब्द उन शब्दों को कहते हैं जिन शब्दों का कोई निश्चित अर्थ होता है। जैसे – विद्यालय, घर, पुस्तक आदि।
(ख) निरर्थक शब्द : निरर्थक शब्द उन शब्दों को कहते हैं जिन शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता है। जैसे:- खट, पट, चूँ, वोटी, वानी आदि। किंतु कभी-कभी वाक्यों में इनका प्रयोग सार्थक शब्दों की तरह किया जाता है और तब वे कुछ अर्थ प्रकट करने लगते हैं। जैसे- खट-खट मत करो अर्थात आवाज मत करो। कहीं खटपट हो रही है, उसे पानी-वानी पिला दो, रोटी-वोटी खा लो आदि।
2. रचना या बनावट के आधार पर शब्द के भेद :
रचना या बनावट के आधार पर शब्द तीन प्रकार के होते हैं :-
(क) रूढ़ शब्द (Conventional Word) : वे शब्द जिन्हें निश्चित अर्थ के लिए प्रयोग किया जाता है और प्रचलित हैं, उन्हें ‘रूढ़ शब्द’ कहते हैं। जिस शब्द का आगे सार्थक खंड न किया जा सके; जैसे: जल, घर, कमल, गाय, पेड़, पुस्तक, राम, सीता, यह, वह, मैं, तुम, आप, हम, करेला, दीवार, बंदर, आज, कल, चलना, उठना, सोना, जल्दी, धीरे आदि।
(ख) यौगिक शब्द (Compound Word) : दो या दो से अधिक शब्दों, दो रूपिमों (morphemes) के मेल से बने शब्द भी यौगिक हो सकते हैं। या शब्दांशों के मेल से बनने वाले शब्दों को यौगिक शब्द कहते हैं। यौगिक शब्दों के खंड किए जा सकते हैं और प्रत्येक खंड का अर्थ होता है। जैसे:-
नर + ईश = नरेश
विद्या + आलय = विद्यालय
(ग) योगरूढ़ शब्द : जो शब्द दो या दो से अधिक शब्दों या शब्दांशों से मिलकर बने हों, किंतु जिनका प्रयोग सामान्य अर्थ के लिए न होकर किसी विशेष अर्थ के लिए होता है, योगरूढ़ शब्द कहलाते हैं। जैसे:-
पंकज = पंक + ज ('पंक' यानी कीचड़ और 'ज' अर्थात में उत्पन्न होने वाला) → कमल
लम्बोदर = लम्ब + उदर (लम्ब यानी मोटा और उदर अर्थात पेट) → गणेश जी
दशानन = दश + आनन (दस मुखों वाला) → रावण
नीलकंठ = नील + कंठ (नीले कंठ वाला) → भगवान शिव
चक्रपाणि = चक्र + पाणि (हाथ में चक्र वाला) → भगवान विष्णु
3. उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर शब्द के भेद :
हिंदी भाषा में शब्द कई स्रोतों से आए हैं। इनके आधार पर शब्द चार प्रकार के होते हैं-
(क) तत्सम शब्द : संस्कृत के वे शब्द जो उसी रूप में हिंदी भाषा में प्रयोग में लाए जाते हैं, तत्सम शब्द कहलाते हैं। जैसे : अग्नि, पर्वत, जल, भूमि, वानर, मुख आदि।
(ख) तद्भव शब्द : तद्भव शब्द का अर्थ है- 'उससे उत्पन्न'। जो शब्द संस्कृत के मूल शब्दों से कुछ बिगड़कर हिंदी में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें तद्भव शब्द कहते हैं, जैसे:-
दुग्ध → दूध
अग्नि → आग
हस्त → हाथ
अक्षि → आँख
दन्त → दाँत
कर्ण → कान आदि।
(ग) देशज शब्द : जो शब्द स्थानीय या क्षेत्रीय प्रभाव के कारण आवश्यकतानुसार हिंदी में आ गए हैं, देशज शब्द कहलाते हैं। जैसे : झोंपड़ी, लोटा, खटिया, पगड़ी, ढेला आदि।
(घ) विदेशी शब्द : विदेशी या आगत शब्द वे हैं, जो विदेशी भाषाओं से हिंदी में लिए गए हैं। ये शब्द अपने मूल रूप में ही हिंदी में प्रयुक्त होते हैं। जैसे :- डॉक्टर, स्कूल, पेन, टेबल आदि।
हिंदी में आए कुछ प्रमुख विदेशी शब्द :
अरबी : अखबार, आवाज, इम्तहान, कागज, किताब, कुर्सी, तूफान, मरीज, मुकदमा आदि।
फ़ारसी : अचार, आदमी, आसमान, खराब, कारोबार, खुशामद, खून, चीज, परी, बीमार आदि।
अंग्रेजी : स्कर्ट, फ्रॉक, बेल्ट, टाई, टेलीविजन, कंप्यूटर, रोबोट, पेंसिल, पेन, बस, ट्रक, टीचर, स्कूल, बॉल आदि।
पुर्तगाली : आया, अलमारी, कप्तान, कमरा, गमला, गोदाम, तौलिया, साबुन, बाल्टी, संतरा आदि।
तुर्की : कुर्ता, चाकू, तोप, बंदूक, बीबी, बेगम, सौगात आदि।
4. व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर शब्द के भेद :
व्याकरण के अनुसार प्रयोग के आधार पर शब्द दो प्रकार के होते हैं-
(क) विकारी शब्द : जो शब्द लिंग, वचन, कारक, काल आदि की दृष्टि से बदल जाते हैं, उन्हें ‘विकारी शब्द’ कहते हैं। विकारी शब्द चार होते हैं :- संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया। इनके रूप परिवर्तित हो जाते हैं :
संज्ञा : नदी-नदियाँ-नदियों, पहाड़-पहाड़ी-पहाड़ियाँ-पहाड़ियों
सर्वनाम : मैं-मेरा-मुझे, हम-हमें-हमारा, जिस-जिसने-जिसे-जिससे, जिन-जिन्हें-जिन्होंने
विशेषण : छोटा-छोटे-छोटी, हरा-हरी-हरे, बड़ा-बड़ी-बड़े आदि
क्रिया : गया-गई-गए, नहाता-नहाती-नहाते
(ख) अविकारी शब्द : जो शब्द लिंग, वचन, कारक और काल आदि की दृष्टि से नहीं बदलते, उन्हें ‘अविकारी शब्द’ कहते हैं। अविकारी शब्द भी चार हैं :- क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक। इनके रूप कभी परिवर्तित नहीं होते।
क्रियाविशेषण : मैं/हम/वह माता-पिता की सेवा आजीवन करूँगा/करेंगे/करेगा।
संबंधबोधक : लकड़ी/लकड़ियों के बिना आग नहीं जलेगी।
समुच्चयबोधक : अनुपमा और मंदाकिनी ने कपड़े खरीदे।
विस्मयादिबोधक : अरे! सुनीता आ गई।
(इन वाक्यों में आजीवन, के बिना, और, अरे अविकारी शब्द हैं।)
5. अर्थ के आधार पर शब्द के भेद :
अर्थ के आधार पर शब्द छह प्रकार के होते हैं :-
(क) पर्यायवाची : जिन शब्दों के अर्थ एक जैसे होते हैं, उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं।
पानी : नीर, जल, वारि
कमल : नीरज, जलज, वारिज
बादल : नीरद, जलद, वारिद
(ख) विलोम शब्द : जो शब्द एक-दूसरे का विपरीत अर्थ देते हैं, उन्हें विलोम शब्द कहते हैं।
उन्नति = अवनति | उपकार = अपकार | सुलभ = दुर्लभ | निंदा = प्रशंसा, स्तुति | कृतज्ञ = कृतघ्न | हर्ष = विषाद
(ग) अनेकार्थी शब्द : जिन शब्दों के एक से अधिक अर्थ होते हैं, उन्हें अनेकार्थी शब्द कहते हैं।
पूर्व = एक दिशा, पहले
घट = घड़ा, शरीर
काल = मृत्यु, समय
कर = हाथ, टैक्स
तीर = किनारा, बाण
कुल = वंश, जोड़
(घ) वाक्यांश के स्थान पर एक शब्द :
उपकार को मानने वाला = कृतज्ञ
उपकार को न मानने वाला = कृतघ्न
जो सरलता से प्राप्त होता है = सुलभ
जो सरलता से प्राप्त नहीं होता = दुर्लभ
(ङ) एकार्थी शब्द : सामान्य प्रयोग में जिन शब्दों का प्रमुख अर्थ एक माना जाता है:
पीड़ा = दर्द | गृह = घर | नृत्य = नाच | सूर्य = सूरज
(च) समानाभासी शब्द-युग्म : जिनकी वर्तनी में भिन्नता होते हुए भी उच्चारण में बहुत कम अंतर होता है, परंतु अर्थ भिन्न होते हैं:
अन्न = अनाज / अन्य = दूसरा
अवधि = समय सीमा / अवधी = एक बोली
ओर = तरफ / और = तथा
ग्रह = आकाशीय पिंड / गृह = घर
शब्द रचना
शब्द रचना का आशय नए शब्दों का निर्माण, शब्दों की बनावट और शब्द–गठन से है। हिंदी में दो प्रकार के शब्द होते हैं - रूढ़ और यौगिक। शब्द रचना की दृष्टि से केवल यौगिक शब्दों का अध्ययन किया जाता है। केवल यौगिक शब्दों में ही उपसर्ग और प्रत्यय का प्रयोग करके नए शब्दों की रचना होती है।
शब्द–रचना प्रायः सात प्रकार से होती है :–
(1) व्युत्पत्ति पद्धति :
इस पद्धति में मूल शब्द में उपसर्ग और प्रत्यय जोड़कर नए शब्दों की रचना की जाती है।
उपसर्ग : वे शब्दांश जो किसी शब्द के आरंभ में लगकर उनके अर्थ में विशेषता ला देते हैं या अर्थ बदल देते हैं। जैसे :- 'लिख्' मूल धातु में 'सु' उपसर्ग लगाने से 'सुलेख' बनता है। 'हार' शब्द में 'वि' लगाने से विहार, 'प्र' लगाने से प्रहार बनता है।
उपसर्ग-संधि नियम :
इ + अ = य (यदि + अपि = यद्यपि)
इ + आ = या (अति + आवश्यक = अत्यावश्यक)
इ + उ = यु (अति + उत्तम = अत्युत्तम)
इ + ऊ = यू (अति + ऊष्म = अत्यूष्म)
ऋ + आ = रा (पितृ + आदेश = पित्रादेश)
विशेष : एक से अधिक उपसर्ग भी लग सकते हैं; जैसे :-
प्रति + उप + कार = प्रत्युपकार,
सम् + आ + लोचन = समालोचन,
अ + परा + जय = अपराजय।
उपसर्ग के भेद :
संस्कृत उपसर्ग : अति, अधि, अनु, अप, अव, अभि, आ, उत्, उप, दुर्, दुस्, नि, निर्, निस, परा, परि, प्रति, प्र, वि, सम्, सु।
देशी या हिंदी उपसर्ग : अ, अन, अध, आप, उ, उन, औ, क, का, कु, चौ, ति, दु, नाना, नि, पच, पर, बहु, बिन, भर, स, सम।
विदेशी उपसर्ग :
उर्दू-फ़ारसी : अल, कम, खुश, गैर, दर, ना, बा, बद, बे, ला, सर, हम, हर, ब, बिला, बेश, नेक, ऐन।
अंग्रेजी : सब, हेड, एक्स, हाफ, को, डिप्टी, वाइस, जनरल, चीफ।
अव्यय शब्द जो उपसर्ग की तरह प्रयोग किए जाते हैं।
प्रत्यय : वे शब्दांश जो किसी शब्द के अंत में लगकर उनके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता लाते हैं। जैसे :-
'लिख्' + 'अक' = लेखक,
'संहार' + 'ई' = संहारी।
अपवाद : बाल → बालक, मृदु → मृदुल (अर्थ समान रहता है)।
नियम : प्रत्यय लगने पर संधि नहीं होती बल्कि अंतिम वर्ण पर स्वर की मात्रा लग जाती है (लोहा + आर = लुहार, नाटक + कार = नाटककार)।
उपसर्ग एवं प्रत्यय एक साथ : प्राक् + इतिहास + इक = प्रागैतिहासिक।
(2) संधि व समास पद्धति :
दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर नए शब्द बनाना।
समास : पद से च्युत = पदच्युत, शक्ति के अनुसार = यथाशक्ति, रात और दिन = रात-दिन
संधि : विद्या + आलय = विद्यालय, प्रति + उपकार = प्रत्युपकार, मनः + हर = मनोहर
(3) शब्दावृत्ति पद्धति :
शब्दों की आवृत्ति या अनुकरण ध्वनियों से : रातों-रात, हाथों-हाथ, दिनों-दिन, खटखट, फटाफट, गड़गड़ाहट, सरसराहट।
(4) वर्ण-विपर्यय पद्धति :
अक्षरों के उलट-फेर से : जानवर से जिनावर, अँगुली से उँगली, पागल से पगला।
(5) संक्षिप्त रूप (Abbreviation) :
आरंभिक वर्णों से: प्रो., डॉ., सं., फ़ा. आदि।
(6) परिवर्णी शब्द (Acronym) :
प्रथम अक्षरों के मेल से : भाजपा (BJP), बीबीसी (BBC), इसरो (ISRO), नासा (NASA), यूजीसी (UGC), एनसीईआरटी (NCERT) आदि।
(7) छाँटा हुआ रूप (Clipped Form) :
अंग्रेजी शब्दों का देवनागरीकरण : telephone → 'फोन', gymnasium → 'जिम'।
भाषा की संरचनात्मक इकाइयाँ
रेखा शर्मा,
सेवानिवृत्त सहायक निदेशक,
केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, गृह मंत्रालय
भारत सरकार



महोदया शब्दों के भेद की जानकारी अत्यंत ही विस्तार पूर्वक आपने बताया। जानकारी बहुत ही उपयोगी है।